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सरगुजा भारतीय राज्य छत्तीसगढ़ का एक जिला है ।जिले का मुख्यालय अम्बिकापुर है ।भारत देश के छत्तीसगढ राज्य के उत्तर-पुर्व भाग में आदिवासी बहुल जिला सरगुजा स्थित है। इस जिले के उत्तर में उत्तरप्रदेश राज्य की सीमा है, जबकी पूर्व में झारखंड राज्य है। जिले के दक्षिणी क्षेत्र में छत्तीसगढ का रायगढ, कोरबा एवं जशपुर जिला है, जबकी इसके पश्चिम में कोरिया जिला है।
स्थितिइस जिले का अक्षांशिय विस्तार 230 37' 25" से 240 6' 17" उत्तरी अक्षांश और देशांतरिय विस्तार 810 37' 25" से 840 4' 40" पूर्व देशांतर तक है। यह जिला भौतिक संरचना के रुप से विंध्याचल-बघेलखंड और छोटा नागपुर का अभिन्न अंग है। इस जिले की समुद्र सतह से उंचाई लगभग 609 मीटर है। स्थापनाइस जिले की स्थापना 1 जनवरी 1948 को हुआ था जो 1 नवम्बर 1956 को मध्यप्रदेश राज्य के निर्माण के तहत मध्यप्रदेश में शामिल कर दिया गया। उसके बाद 25 मई 1998 को इस जिले का प्रथम प्रशासनिक विभाजन करके कोरिया जिला बनाया गया। जिसके बाद वर्तमान सरगुजा जिला का क्षेत्रफल 16359 वर्ग किलोमीटर है । 1 नवम्बर 2000 जब छत्तीसगढ राज्य मध्यप्रदेश से अलग हुआ तब सरगुजा जिले को छत्तीसगढ राज्य मे शामिल कर दिया गया। नामकरण:सरगुजा के इतिहास से हमे यह पता चलता है कि सरगुजा कईं नामों से जाना जाता रहा है एक ओर जहां रामायण युग में इसे दंडकारण्य कहते थे वहीं दुसरी ओर दशवीं शताब्दी में इसे डांडोर के नाम से जाना जाता था। यह कहना कठिन है कि इस अंचल का नाम सरगुजा कब और क्यों पडा। वास्तव में सरगुजा किसी एक स्थान विशेष का नाम नहीं है बल्कि जिले के समूचे भू-भाग को ही सरगुजा कहा जाता है। प्राचिन मान्यताओ के अनुसार पूर्व काल में सरगुजा को निचे दिये गये नाम से जाना जाता था:
वर्तमान में इस जिले को सरगुजा नाम से ही जाना जाता है। जिसका अंग्रेजी भाषा में उच्चारण आज भी SURGUJA ही हो रहा है। जलवायुजलवायु वह भौगोलिक अवस्था है जो समस्त स्थानिय दशाओं को प्रभावित करती है ।सरगुजा जिला भारत के मध्य भाग में स्थित है जिसके कारण यहां कि जलवायु उष्ण-मानसुनी है। सरगुजा जिले में जलवायु मुख्यत: तीन ऋतु अवस्थाओं का होता है जो निम्नांकित है।
यह ऋतु मार्च से जुन माह तक होती है चुंकि कर्क रेखा जिला के मध्य में प्रतापपुर से होकर गुजरती है इस लिये गर्मीयों में सुर्य की किरणें यहां सीधे पड्ती है इस लिये यहां का तापमान गर्मीयों में उच्च रहता है। इस ऋतु में जिले के पठारी इलाकों में गर्मीयां शीतल एवम सुहावनी होती है। इस दौरान सरगुजा जिले के मैनपाट जिसे छ्त्तीशगढ के शिमला के नाम से भी जाना जाता है, का तापमान अपेक्षाकृत कम होता है जिससे वहां का मौसम भी सुहावना होता है
यह ऋतु जुलाई से अक्टुबर तक होती है जिले में जुलाई व अगस्त में सर्वाधिक वर्षा होती है। जिले के दक्षीणी क्षेत्र में वर्षा सर्वाधिक होती है। यहां की वर्षा मानसुनी प्रवृति की होती है
इस ऋतु की शुरुवात नवम्बर में होती है और फरवरी माह तक रहती है जनवरी यहां का सबसे ठंड का महिना होता है जिले के पहाडी इलाकों जैसे मैनपाट, सामरीपाट में तापमान 5 0 से कम चला जता है। कभी कभी इन इलाकों में पाला भी पडता है। जिला प्रशासनसरगुजा जिले में:
दर्शनीय स्थलयहां अनेक जल प्रपात हैं:- चेन्द्रा ग्रामअम्बिकापुर- रायगढ राजमार्ग़ पर 15 किमी की दुरी पर चेन्द्रा ग्राम स्थित हैं। इस ग्राम से उत्तर दिशा में तीन कि.मी. की दुरी पर यह जल प्रपात स्थित हैं। इस जलप्रपात के पास ही वन विभाग का एक नर्सरी हैं, जहां विभिन्न प्रकार के पेड-पौधों को रोपित किया गया हैं। इस जल प्रपात में वर्ष भर पर्यटक प्राकृतिक सौन्दर्य का आनंद लेने जाते हैं। यहां पर एक तितली पार्क भी विकसित किया जा रहा है। रकसगण्डा जल प्रपातओडगी विकासखंड में बिहारपुर के निकट बलंगी नामक स्थान के समीप स्थित रेंहड नदी पर्वत श्रृखला की उंचाई से गिरकर रकसगण्डा जल प्रपात का निर्माण करती है जिससे वहां एक संकरे कुंड का निर्माण होता हैं यह कुंड अत्यंत गहरा है। इस कुंड से एक सुरंग निकलकर लगभग 100 मीटर तक गई है। यह सुरंग जहां समाप्त होता है, वहां एक विशाल जलकुंड बन गया है। रकसगण्डा जल प्रपात अपनी विलक्षणता एवं प्राकृतिक सौंन्दर्य के कारण पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है। रियासत काल में अंग्रेज यहां मछलियों क शिकार करने जाया करते थे। भेडिया पत्थर जल प्रपातकुसमी चान्दो मार्ग पर तीस किमी की दुरी पर ईदरी ग्राम है । ईदरी ग्राम से तीन किमी जंगल के बीच भेडिया पत्थर नामक जलप्रपात है । यहां भेडिया नाला का जल दो पर्वतो के सघन वन वृक्षो के बीच प्रवाहित होता हुआ ईदरी ग्राम के पास हजारो फीट की उंचाई पर पर्वत के मध्य मे प्रवेश कर विशाल चट्टानो. के बीच से बहता हुआ 200 फीट की उंचाई से गिरकर अनुपम प्राकृतिक सौदर्य निर्मित करता है । दोनो सन्युक्त पर्वत के बीच बहता हुआ यह जल प्रपात एक पुल के समान दिखाई देता है। इस जल प्रपात के जलकुंड के पास ही एक प्राकृतिक गुफा है, जिसमे पहले भेडिये रहा करते थे। यही कारण है की इस जल प्रपात को भेडिया पत्थर कहा जाता है। बेनगंगा जल प्रपातकुसमी- सामरी मार्ग पर सामरीपाट के जमीरा ग्राम के पूर्व -दक्षिण कोण पर पर्वतीय श्रृंखला के बीच बेनगंगा नदी का उदगम स्थान है। यहा साल वृक्षो के समूह मे एक शिवलिंग भी स्थापित है । वनवासी लोग इसे सरना का नाम देते है और इस स्थान को पूजनीय मानते है। सरना कुंज के निचले भाग के एक जलस्त्रोत का उदगम होता है। यह जल दक्षिण दिशा की ओर बढता हुआ पहाडी के विशाल चट्टानो के बीच आकार जल प्रपात का रुप धारण करता है। प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण सघन वनों, चट्टानों को पार करती हुयी बेनगंगा की जलधारा श्रीकोट की ओर प्रवाहित होती है । गंगा दशहारा पर आस -पास के ग्रामीण एकत्रित होकर सरना देव एवं देवाधिदेव महादेव की पूजा - अर्चना करने के बाद रात्रि जागरण करते है । प्राकृतिक सुषमा से परिपूर्ण यह स्थान पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है। सेदम जल प्रपातअम्बिकापुर- रायगढ मार्ग पर अम्बिकापुर से 45 कि.मी की दूरी पर सेदम नाम का गांव है। इसके दक्षिण दिशा में दो कि.मी. की दूरी पर पहाडियों के बीच एक सुन्दर झरना प्रवाहित होता है। इस झरना के गिरने वाले स्थान पर एक जल कुंड निर्मित है। यहां पर एक शिव मंदिर भी है। शिवरात्री पर सेदम गांव में मेला लगता है। इस झरना को राम झरना के नाम से भी जाना जाता है। यहां पर्यटक वर्ष भर जाते हैं।
मैनपाटमैनपाट अम्बिकापुर से 75 किलोमीटर दुरी पर है इसे छत्तीसगढ का शिमला कहा जाता है। मैंनपाट विन्ध पर्वत माला पर स्थित है जिसकी समुद्र सतह से ऊंचाई 3781 फीट है इसकी लम्बाई 28 किलोमीटर और चौडाई 10 से 13 किलोमीटर है अम्बिकापुर से मैंनपाट जाने के लिए दो रास्ते है पहला रास्ता अम्बिकापुर-सीतापुर रोड से होकर जाता और दुसरा ग्राम दरिमा होते हुए मैंनपाट तक जाता है। प्राकृतिक सम्पदा से भरपुर यह एक सुन्दर स्थान है। यहां सरभंजा जल प्रपात, टाईगर प्वांइट तथा मछली प्वांइट प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं। मैनपाट से ही रिहन्द एवं मांड नदी का उदगम हुआ है। इसे छत्तीसगढ का तिब्बत भी कहा जाता हैं। यहां तिब्बती लोगों का जीवन एवं बौध मंदिर आकर्षण का केन्द्र है। यहां पर एक सैनिक स्कूल भी प्रस्तावित है। यह कालीन और पामेरियन कुत्तो के लिये प्रसिद्ध है। ठिनठिनी पत्थरअम्बिकापुर नगर से 12 किमी. की दुरी पर दरिमा हवाई अड्डा हैं। दरिमा हवाई अड्डा के पास बडे - बडे पत्थरो का समुह है। इन पत्थरो को किसी ठोस चीज से ठोकने पर आवाजे आती है। सर्वाधिक आश्चर्य की बात यह है कि ये आवाजे विभिन्न धातुओ की आती है। इनमे से किसी - किसी पत्थर खुले बर्तन को ठोकने के समान आवाज आती है। इस पत्थरो मे बैठकर या लेटकर बजाने से भी इसके आवाज मे कोइ अंतर नही पडता है। एक ही पत्थर के दो टुकडे अलग-अलग आवाज पैदा करते है। इस विलक्षणता के कारण इस पत्थरो को अंचल के लोग ठिनठिनी पत्थर कहते है। कैलाश गुफाअम्बिकापुर नगर से पूर्व दिशा में 60 किमी. पर स्थित सामरबार नामक स्थान है, जहां पर प्राकृतिक वन सुषमा के बीच कैलाश गुफा स्थित है। इसे परम पूज्य संत रामेश्वर गहिरा गुरू जी नें पहाडी चटटानो को तराशंकर निर्मित करवाया है। महाशिवरात्रि पर विशाल मेंला लगता है। इसके दर्शनीय स्थल गुफा निर्मित शिव पार्वती मंदिर, बाघ माडा, बधद्र्त बीर, यज्ञ मंड्प, जल प्रपात, गुरूकुल संस्कृत विद्यालय, गहिरा गुरू आश्रम है। तातापानीअम्बिकापुर-रामानुजगंज मार्ग पर अम्बिकापुर से लगभग 80 किमी. दुर राजमार्ग से दो फलांग पश्चिम दिशा मे एक गर्म जल स्त्रोत है। इस स्थान से आठ से दस गर्म जल के कुन्ड है। इस गर्म जल के कुन्डो को सरगुजिया बोली मे तातापानी कहते है। ताता का अर्थ है- गर्म। इन गर्म जलकुंडो मे स्थानीय लोग एवं पर्यटक चावल ओर आलु को कपडे मे बांध कर पका लेते है तथा पिकनिक का आनंद उठाते है।इन कुन्डो के जल से हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी गन्ध आती है। एसी मान्यता है कि इन जल कुंडो मे स्नान करने व पानी पीने से अनेक चर्म रोग ठीक हो जाते है। इन दुर्लभ जल कुंडो को देखने के लिये वर्ष भर पर्यटक आते रहते है। सारासौरअम्बिकापुर - बनारस रोड पर 40 किमी. पर भैंसामुडा स्थान हैं। भैंसामुडा से भैयाथान रोड पर 15 किमी. की दूरी पर महान नदी के तट पर सारासौर नामक स्थान हैं। यहां पर महान नदी दो पहाडियों के बीच से बहने वाली जलधारा के रुप मे देखी जा सकती हैं। इस जलधारा के मध्य एक छोटा टापू है, जिस पर भव्य मंदिर निर्मित है जिंसमे देवी दुर्गा एवं सरस्वती की प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर को गंगाधाम के नाम से जाना जाता है। बांक जल कुंडअम्बिकापुर से भैयाथान से अस्सी कि.मी की दूरी पर ओडगी विकासखंड है, यहां से 15 किमी. की दुरी पर पहाडियों की तलहटी में बांक ग्राम बसा है। इसी ग्राम के पास रिहन्द नदी वन विभाग के विश्राम गृह के पास अर्द्ध चन्द्राकार बहती हुई एक विशाल जल कुंड का निर्माण करती है। इसे ही बांक जल कुंड कहा जाता है। यह जल कुंड अत्यंत गहरा है, जिसमें मछलियां पाई जाती है। यहां वर्ष भर पर्यटक मछलियों का शिकार करने एवं घुमनें आते हैं। पुरातात्विक स्थलरामगढयह सरगुजा के एतिहासिक स्थलो में सबसे प्राचिन है। यह अम्बिकापुर- बिलासपुर मार्ग में स्थित है। इसे रामगिरि भी कहा जाता है। लक्ष्मणगढअम्बिकापुर से 40 किमी. की दूरी पर लक्ष्मणगढ स्थित है। यह स्थान अम्बिकापुर - बिलासपुर मार्ग पर महेशपुर से 03 किमी. की दूरी पर है। ऐसा माना जाता है कि इसका नाम वनवास काल में श्री लक्ष्मण जी के ठहरने के कारण पडा। य़ह स्थान रामगढ के निकट ही स्थित है। यहां के दर्शनीय स्थल शिवलिंग(लगभग 2 फिट), कमल पुष्प, गजराज सेवित लक्ष्मी जी, प्रस्तर खंड शिलापाट पर कृष्ण जन्म और प्रस्तर खंडो पर उत्कीर्ण अनेक कलाकृतिय़ां है। कंदरी प्राचीन मंदिरअम्बिकापुर- कुसमी- सामरी मार्ग पर 140 किमी. की दूरी पर कंदरी ग्राम स्थित है। यहां पुरातात्विक महत्व का एक विशाल प्राचीन मंदिर है। अनेक पर्वो पर यहां मेले का आयोजन होता रहता है। यहां के दर्शनीय स्थल - अष्ट्धातु की श्री राम की मूर्ति, भगवान शिव की मूर्ति, श्री गणेश की मूर्ति, श्री जगन्नथ जी की काष्ठ मूर्ति और देवी दुर्गा की पीतल की कलात्मक मूर्ति और प्राकृतिक सौंदर्य है। अर्जुनगढअर्जुंनगढ स्थान शंकरगढ विकासखंड के जोकापाट के बीहड जंगल में स्थित है। यहां प्राचीन कीले का भग्नावेष दिखाई पड्ता है। एक स्थान पर प्राचीन लंबी ईंटो का घेराव है। इस स्थान के नीचे गहरी खाई है, जहां से एक झरना बहता है। किवदंती है कि पहले एक सिद्धपुरूष का निवास था। इस पहाडी क्षेत्र मे एक गुफा है जिसे धिरिया लता गुफा के नाम से जाना जाता है। अर्जुनगढ मे प्राचीन पुरातात्विक पुरातात्विक महत्व के अवशेष आज भी देखनें को मिलते हैं। सीता लेखनीसुरजपुर तहसील के ग्राम महुली के पास एक पहाडी पर शैल चित्रों के साथ ही साथ अस्पष्ट शंख लिपि की भी जानकारी मिली है। ग्रामीण जनता इस प्राचीनतम लिपि को "सीता लेखनी" कहती है। डिपाडीहडिपाडीह कनहर,सूर्या तथा गलफुला नदियों के संगम के किनारे बसा हुआ है। यह चारों ओर पहाडियों से घिरा मनोरम स्थान है। यहां चार पांच किलोमीटर के क्षेत्रफल में कई मन्दिरों के टिले है। मान्यता के अनुसार यहां पर आठ्वी शताब्दी में स्थापित कई मूर्तियां है उसमें प्रमुख रूप से भगवान शिव एवं देवी की मूर्तियां मिली है। ऐसा भी माना जाता है कि यह नौवीं शताब्दी में शैव सम्प्रदाय का साधना स्थल रहा होगा। महेशपुरमहेश्पुर, उदयपुर से उत्तरी दिशा में 08 किमी. की दूरी पर स्थित है। उदयपुर से केदमा मार्ग पर जाना पड्ता है। इसके दर्शनीय स्थल प्राचीन शिव मंदिर (दसवीं शताब्दी), छेरिका देउर के विष्णु मंदिर (10वीं शताब्दी), तीर्थकर वृषभ नाथ प्रतीमा (8वीं शताब्दी), सिंहासन पर विराजमन तपस्वी, भगवान विष्णु-लक्ष्मी मूर्ति, नरसिंह अवतार, हिरण्यकश्यप को चीरना, मुंड टीला (प्रहलाद को गोद मे लिए), स्कंधमाता, गंगा-जमुना की मूर्तिया, दर्पण देखती नायिका और 18 वाक्यो का शिलालेख हैं। सतमहलाअम्बिकापुर के दक्षिण में लखनपुर से लगभग दस कि.मी. की दूरी पर कलचा ग्राम स्थित है, यहीं पर सतमहला नामक स्थान है। यहां सात स्थानों पर भग्नावशेष है। एक मान्यता के अनुसार यहां पर प्राचिन काल में सात विशाल शिव मंदिर थे, जबकि जनजातियों के अनुसार इस स्थान पर प्राचीन काल में किसी राजा का सप्त प्रांगण महल था। यहां पर दर्शनीय स्थल शिव मंदिर, षटभुजाकार कुंआ और सूर्य प्रतिमा है। धार्मिक स्थलमहामाया मन्दिरसरगुजा जिले के मुख्यालय अम्बिकापुर के पूर्वी पहाडी पर प्राचिन महामाया देवी का मंदिर स्थित है। इन्ही महामाया या अम्बिका देवी के नाम पर जिला मुख्यालय का नामकरण अम्बिकापुर हुआ। एक मान्यता के अनुसार अम्बिकापुर स्थित महामाया मन्दिर में महामाया देवी का धड स्थित है इनका सिर बिलासपुर जिले के रतनपुर के महामाया मन्दिर में है। इस मन्दिर का निर्माण महामाया रघुनाथ शरण सिहं देव ने कराया था। चैत्र व शारदीय नवरात्र में विशेष रूप अनगिनत भक्त इस मंदिर में जाकर पूजा अर्चना करते है। तकियाअम्बिकापुर नगर के उतर-पूर्व छोर पर तकिया ग्राम स्थित है इसी ग्राम में बाबा मुराद शाह, बाबा मुहम्मद शाह और उन्ही के पैर की ओर एक छोटी मजार उनके तोते की है यहां पर सभी धर्म के एवं सम्प्रदाय के लोग एक जुट होते हैं मजार पर चादर चढाते हैं और मन्नते मांगते है बाबा मुरादशाह अपने "मुराद" शाह नाम के अनुसार सबकी मुरादे पूरी करते हैं। इसी मजार के पास ही एक देवी का भी स्थान है इस प्रकार इस स्थान पर हिन्दू देवी देवता और मजार का एक ही स्थान पर होना धार्मिक एवं सामाजिक समन्वय का जीवंत उदाहरण है। कुदरगढकुदरगढ सरगुजा जिले के भैयाथान के निकट एक पहाडी के शिखर पर स्थित है। यहां पर भगवती देवी का एक प्रसिद्ध मंदिर है, इस मंदिर के निकट तालाबों और एक किले का खंडहर है कहा जाता है कि यह किला विन्ध क्षेत्र के राजा बुलन्द का है कुदरगढ मे रामनवमीं के अवसर पर भारी भीड रहती है और इस समय यहां विशाल मेला लगता है । पारदेश्वर शिव मंदिरपारदेश्वर शिव मंदिर प्रतापपुर विकास खण्ड् से डेढ किमी. दक्षिण की ओर बनखेता में मिशन स्कूल के निकट नदी किनारे स्थापित है। इस शिव मंदिर में लगभग 21 किलो शुद्ध पारे की एक मात्र अनोखी "पारद शिवलिंग" स्थापित है। शिवपुरअम्बिकापुर से प्रतापपुर की दूरी 45 किमी. है। प्रतापपुर से 04 किमी. दूरी पर शिवपुर ग्राम के पास एक पहाडी की तलहटी में अत्यंत मनोरम प्राकृतिक वातावरण में एक प्राचीन शिव मंदिर है। इस पहाडी से एक जलस्त्रोत झरने के रुप में प्रवाहित होता है। यह झरना शिव लिंग पर गंगाधारा के रुप में प्रवाहित होता हुआ नीचे की ओर बहता है। इस मनोरम दृश्य को देखकर आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति होती है। इसे लोक शिवपुर तुर्रा भी कहते हैं। यह स्थान पवित्र माना जाता है एवं जन सामान्य द्वारा पूजित है। यहां पर महाशिव रात्रि पर मेला लगता है। शिवपुर तुर्रा को 1992में शासन द्वारा संरक्षित घोषित किया गया है। बिलद्वार गुफायह गुफा शिवपुर के निकट अम्बिकापुर से एक घण्टे की दूरी पर है| इसमें अनेक प्राचीन मूर्तियां हैं| इसमें महान नामक एक नदी का पानी निकलता रहता है, वहीं इस नदी का उद्गम भी है| इस गुफा का दूसरा छोर महामाया मंदिर के निकट निकलता है| देवगढअम्बिकापुर से लखंनपुर 28 किमी. की दूरी पर है एवं लखंनपुर से 10 किमी. की दूरी पर देवगढ स्थित है। देवगढ प्राचीन काल में ऋषि यमदग्नि की साधना स्थलि रही है। इस शिवलिंग के मध्यभाग पर शक्ति स्वरुप पार्वती जी नारी रुप में अंकित है। इस शिवलिंग को शास्त्रो में अर्द्ध नारीश्वर की उपाधि दी गई है। इसे गौरी शंकर मंदिर भी कहते है। देवगढ में रेणुका नदी के किनारे एकाद्श रुद्ध मंदिरों के भग्नावशेष बिखरे पडे है। देवगढ में गोल्फी मठ की संरचना शैव संप्रदाय से संबंधित मानी जाती है । इसके दर्शनीय स्थल, मंदिरो के भग्नावशेष, गौरी शंकर मंदिर, आयताकार भूगत शैली शिव मंदिर, गोल्फी मठ, पुरातात्विक कलात्मक मूर्तियां एवं प्राकृतिक सौंदर्य है। अभयारण्यसेमरसोत1978 में स्थापित सेमरसोत अभ्यारण्य सरगुजा जिलें के पूर्वी वनमंडल में स्थित है। इसका क्षेत्रफल 430.361 वर्ग कि. मी. है। जिला मुख्यालय अम्बिकापुर से 58 कि.मी. की दूरी पर यह बलरामपुर, राजपुर, प्रतापपुर विकास खंडों में विस्तृत है। अभ्यारण्य में सेंदुर, सेमरसोत, चेतना, तथा सासू नदियों का जल प्रवाहित होता है। अभ्यारण्य के अधिकांश क्षेत्र में सेमर सोत नदी बहती है इस लिए इसका नाम सेमरसोत पडा। इसका विस्तार पूर्व से पश्चिम 115 कि.मी. और उत्तर से दक्षिण में 20 कि.मी. है। यहां पर शेर, तेन्दुआ, सांभर, चीतल, नीलगाय, वार्किगडियर, चौसिंहा, चिंकरा, कोटरी जंगली कुत्ता, जंगली सुअर, भालू, मोर, बंदर, भेडियां आदि पाये जाते हैं। तमोर पिंगला1978 में स्थापित अम्बिकापुर-वाराणसी राजमार्ग के 72 कि. मी. पर तमोर पिंगला अभ्यारण्य है जहां पर डांडकरवां बस स्टाप है। 22 कि.मी. पश्चिम में रमकोला अभ्यारण्य परिक्षेत्र का मुख्यालय है। यह अभ्यारंय 608.52 वर्ग कि.मी. क्षेत्रफल पर बनाया गया है जो वाड्रफनगर क्षेत्र उत्तरी सरगुजा वनमंडल में स्थित है। इसकी स्थापना 1978 में की गई। इसमें मुख्यत: शेर तेन्दुआ, सांभर, चीतल, नीलगाय, वर्किडियर, चिंकारा, गौर, जंगली सुअर, भालू, सोनकुत्ता, बंदर, खरगोश, गिंलहरी, सियार, नेवला, लोमडी, तीतर, बटेर, चमगादड, आदि मिलते हैं। प्रसिद्ध व्यक्ति
इनका जन्म सरगुजा जिलें के प्रतापपुर विकासखण्ड के शारदापुर ग्राम में सन 1914 को हुआ था। इनका जीवन संघर्षमय था। इनका वास्तविक नाम रजमन बाई था। महात्मा गांधी से प्रेरित होकर इन्होनें सरगुजा जिलें एवं दुसरे राज्यों जैसे बिहार तथा उत्तरप्रदेश के सीमावर्ती ग्रामों में समाज सुधार के लिये अपना संदेश लोगो तक पहुंचाया। उनका संदेश था- " जीव हिंसा मत करों, शराब पीना छोड दो, मांस भक्षण मत करों, सन्मार्ग पर चलों, इसी में जीवन का सार है।" इन्हें सन 1986 में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय समाज सेवा पुरुस्कार तथा 1989 मे राष्ट्रपति द्वारा "पद्म श्री" पुरुस्कार से सम्मानित किया गया था। 6 जनवरी 1994 को राजमोहनी देवी ने दुनिया को अलविदा कहा।
सरगुजा जिलें के मुख्यालय अम्बिकापुर से लगभग 28 किमी की दुरी पर अम्बिकापुर-बिलासपुर मार्ग पर लखनपुर स्थित है। इसके पास ग्राम पुहपुटरा में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सिद्धहस्थ शिल्पी श्रीमती सोनाबाई रजवार का निवास है। मिट्टी शिल्प के लिये इन्हें राष्ट्रपति पुरुस्कार, म0 प्र0 शासन का तुलसी सम्मान एवं शिल्प गुरु अवार्ड से सम्मानित किया गया है। इनके द्वारा बनाई गई मिट्टी की अनेक कलाकृतियों का प्रदर्शन देश एवं विदेशों मे आयोजित कई प्रदर्शनियों में किया जा चुका है।
सरगुजा जिलें के मुख्यालय अम्बिकापुर के निवासी चित्रकार श्री श्रवण शर्मा ने अपनी मनमोहक चित्रकारी से इस जिलें को गौरवांवित किया हैं। इनके द्वारा सरगुजा जिलें के प्राकृतिक सौन्दर्य , ग्रामीणों का जीवन इत्यादि विषयों पर कई चित्र बनाया गया है। अब तक इनके द्वारा हजारों पेंटिग्स एवं रेखाचित्रों का सृजन किया जा चुका है। "अकाल और रो" चित्र के लिये इन्हें भारत सरकार से सम्मानित भी किया जा चुका है। सरगुजा जिलें को गौरवांवित करने वाले और भी कई व्यक्ति हैं जिन्होनें अपनी प्रतिभा से कुछ ऐसा कार्य किया जिससे इस जिले का नाम रोशन हुआ। कैसे पहुंचेंप्रकृति ने सरगुजा जिलें को विभिन्न प्रकार के वनों, सरोवरों, नदियों, पहाड इत्यादि से इस प्रकार परिपूर्ण किया है कि आप इस पावन धरती पर जरुर आना चाहेंगे। इसी धरती पर जहां एक ओर महाकवि कालीदास नें अपने सुप्रसिध महाकाव्य 'मेघदुत' की रचना की थी, वहीं दुसरी ओर भगवान राम, सीता माता और भाई लक्ष्मण सहित यहां वनवास के कुछ दिन काटे थे। सरगुजा जिला सडक एवं रेल मार्ग से सीधे जुडा हुआ है।
छत्तीसगढ राज्य में :
सरगुजा जिला मुख्यालय अम्बिकापुर 03 जुन 2006 से रेल मार्ग से जुड गया है । अम्बिकापुर शहर के मुख्य मार्ग देवीगंज रोड पर स्थित गांधी चौक से रेल्वे स्टेशन की दुरी लगभग 5 किमी है। यहां से टैम्पो, टैक्सी इत्यादी से अम्बिकापुर शहर आया जा सकता है। आप निम्न ट्रेंन रुट का प्रयोग अम्बिकापुर आने के लिये कर सकते है:
बिलासपुर से अम्बिकापुर आने के लिये बस और ट्रेंन दोनो का प्रयोग किया जा सकता है। बस अम्बिकापुर तक सीधे आती है जबकी ट्रेंन अनुपपुर (मध्यप्रदेश) होतें हुये अम्बिकापुर तक आती है। रायगढ से अम्बिकापुर आने के लिये बस की सुविधा ही उपलब्ध है।
अम्बिकापुर सीधे आने के लिये वायु मार्ग उपलब्ध नहीं है, आप रायपुर तक देश के निम्न स्थानों से वायु मार्ग से आ सकते है, उसके बाद रायपुर से अम्बिकापुर आने के लिये बस का प्रयोग करना होगा:
बाहरी कड़ियां
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